सच्चिदानंद सच्चूक ‘जाल’ : प्रेम सं सामाजिक संघर्ष धरि मनुष्यक स्वतंत्रताक कथा
राहुल राज
सच्चिदानंद सच्चूक मैथिली उपन्यास जाल मूलतः प्रेमक कथा अछि, मुदा एकर कथा-परिधि मात्र प्रेम-संबंध धरि सीमित नहि रहि जाइत अछि। प्रेमक माध्यम सं उपन्यासकार मिथिला समाजक जातीय विभाजन, पितृसत्तात्मक मानसिकता, राजनीतिक प्रपंच, सामाजिक रूढ़ि, प्रशासनिक उदासीनता आ बदलैत सामाजिक चेतनाक कतेको परत खोलबाक प्रयास कयने छथि। एहि अर्थ मे जाल कें एकटा प्रेम-कथा कहब एकर व्यापक सरोकार कें छोट करब होयत। उपन्यासक शीर्षक स्वयं एहि रचनाक केंद्रीय प्रतीक बनि जाइत अछि – मनुष्यक चारू कात पसरल ओ अदृश्य जाल, जाहि मे व्यक्ति अपन इच्छा, प्रेम आ स्वतंत्रताक बादो बेर-बेर फंसैत अछि।
कथाक केंद्र मे महेसर आ सुनीता अछि। महेसर मल्लाह समुदाय सं अबैत अछि, जखन कि सुनीता एकटा राजनीतिक रूप सं प्रभावशाली सवर्ण परिवारक बेटी अछि। एहि अंतरजातीय प्रेमक पृष्ठभूमि मे मात्र दुइ व्यक्ति नहि, बल्कि दू सामाजिक संसार आमने-सामने ठाढ़ देखाइ पड़ैत अछि। सुनीताक पिता बिदेसर मिसिर स्थानीय राजनीति, सत्ता आ सामाजिक प्रभावक प्रतीक छथि। बेटी द्वारा अपन पसिनक युवकक संग विवाहक निर्णय हुनकर पितृसत्तात्मक अधिकारबोध कें चुनौती दैत अछि। फलतः व्यक्तिगत प्रेम धीरे-धीरे सामाजिक संघर्ष मे बदलि जाइत अछि।
जालक एकटा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई अछि जे उपन्यासकार प्रेम कें मात्र भावुकता अथवा रोमानी आकर्षणक रूप मे प्रस्तुत नहि करैत छथि। सुनीता आ महेसरक संबंधक पाछां सामाजिक बराबरी, आत्मसम्मान आ अपन जीवनक निर्णय स्वयं लेबाक आकांक्षा सेहो अछि। एहि कारणें प्रेमक कथा सामाजिक सरोकारक कथा बनि जाइत अछि। सुनीताक चरित्र विशेष रूप सं ध्यान आकर्षित करैत अछि। ओ मात्र प्रेम मे पड़ल युवती नहि, बल्कि अपन निर्णय पर ठाढ़ रहनिहार, परिस्थिति सं जुझनिहार आ धीरे-धीरे सामाजिक सक्रियता दिस बढ़निहार स्त्रीक रूप मे विकसित होइत छथि।
महेसरक चरित्रक निर्माण सेहो अपेक्षाकृत सहज आ विश्वसनीय अछि। ओकर जीवन-शैली, श्रमशीलता, धैर्य आ सरलता कें ओकर सामाजिक पृष्ठभूमि सं जोड़ि कए देखाओल गेल अछि। ओ सत्ता अथवा धनक बल पर अपन जगह नहि बनबैत अछि, बल्कि अपन श्रम, धैर्य आ आत्मबल पर ठाढ़ रहैत अछि। सुनीता आ महेसरक संबंध मे एहि कारणें मात्र प्रेम नहि, बल्कि सामाजिक गतिशीलताक संकेत सेहो अछि। उपन्यासकार दुनू पात्र कें आदर्श प्रतिमा बनेबा सं बचौलनि अछि, हुनका लोकनिक निर्णय, कमजोरी, आकांक्षा आ संघर्षक माध्यम सं विकसित कएलनि अछि।
उपन्यासक दोसर प्रमुख पक्ष बिदेसर मिसिरक चरित्र अछि। ओ मात्र एकटा खलनायक नहि छथि। हुनकर माध्यम सं पितृसत्ता, जातीय श्रेष्ठताबोध, राजनीतिक अवसरवाद आ सत्ता-संरचनाक ओ रूप सामने अबैत अछि जाहि मे परिवार, समाज आ राजनीति एक-दोसरा सं जुड़ल रहैत अछि। बेटी पर अधिकारक भावना, राजनीतिक जोड़-तोड़ आ व्यक्तिगत स्वार्थक बीच हुनकर चरित्र एकटा एहन सत्ता-मानसिकताक प्रतिनिधित्व करैत अछि जे अपन हितक लेल संबंधो कें साधन बना लैत अछि। एहि कारणें जाल मे राजनीतिक भ्रष्टाचार मात्र चुनावी गतिविधि धरि सीमित नहि, बल्कि पारिवारिक संबंध धरि पसरल सामाजिक संरचनाक रूप मे देखाइ पड़ैत अछि।
उपन्यासक कथा-क्षेत्रक विस्तार सेहो उल्लेखनीय अछि। सड़क, अस्पताल, प्रशासन, पंचायत-राजनीति, चुनाव, सरकारी तंत्र आ स्थानीय विकासक प्रश्न सभ कथा मे स्वाभाविक ढंग सं प्रवेश करैत अछि। नवटोलियाक सड़कक प्रसंग विशेष महत्त्व रखैत अछि। सड़कक खराब अवस्था एकटा स्थानीय समस्या सं शुरू होइत अछि, मुदा क्रमशः ई जनजीवन, प्रशासनिक संवेदनहीनता आ जनप्रतिरोधक प्रश्न बनि जाइत अछि। सुनीता आ महेसरक व्यक्तिगत संघर्ष एहि सार्वजनिक प्रश्नक संग जुड़ि जाइत अछि। एहि ठाम उपन्यासकार प्रेम-कथा कें जनजीवनक यथार्थ सं जोड़ि देलनि अछि।
जालक राजनीतिक संसारक चित्रण मे व्यंग्यक तत्व सेहो पर्याप्त अछि। चुनाव, उम्मीदवार, गुटबंदी, प्रशासनिक अधिकारी आ सत्ताधारी वर्गक बीचक संबंधक माध्यम सं लेखक ग्रामीण लोकतंत्रक भीतरक विसंगति देखबैत छथि। एक दिस जनता विकास, सड़क आ सम्मान चाहैत अछि, दोसर दिस राजनीति कतेको बेर जनसमस्या कें अपन स्वार्थक लेल उपयोग करैत अछि। उपन्यासक एहि अंश मे लेखकक पत्रकारिता-अनुभवक प्रभाव सेहो महसूस होइत अछि। घटनाक सूक्ष्म विवरण आ सामाजिक-राजनीतिक वातावरणक चित्रण कथा कें समकालीन बनबैत अछि।
भाषा जालक विशेष शक्ति अछि। उपन्यास मे परिष्कृत मैथिली आ बोलचालक स्थानीय भाषा दुनूक प्रयोग भेटैत अछि। महेसरक संसार, सुनीताक परिवार आ ग्रामीण पात्रक संवाद मे भाषाक स्वर एक समान नहि अछि। एहि भाषिक विविधता सं पात्र अपन-अपन सामाजिक पृष्ठभूमि सहित जीवित बुझाइ पड़ैत छथि। समीक्षकीय टिप्पणी मे सेहो उपन्यासक भाषाक एहि बहुवचनात्मक स्वरूप, संवादक ग्रहणशीलता आ कथाक रोचकता कें विशेषता मानल गेल अछि।
शिल्पक दृष्टिएं जाल मूलतः घटनाप्रधान उपन्यास अछि। एक घटनाक प्रभाव दोसर घटनापर पड़ैत अछि आ कथा लगातार आगू बढ़ैत रहैत अछि। लेखक पाठकक जिज्ञासा बनौने रखबाक लेल कतेको मोड़ आ तनावक उपयोग करैत छथि। एहि कारणें उपन्यास पठनीय बनैत अछि। मुदा एहि घटनाप्रधानता कें कखनो-कखनो कथा पर बेसी भार पड़ैत बुझा सकैत अछि। कतिपय प्रसंग मे सामाजिक टिप्पणी आ घटनाक विस्तारक कारण मूल कथा सं ध्यान क्षणिक रूप सं हटैत अछि। तथापि ई विस्तार उपन्यासक समग्र सामाजिक कैनवास कें सेहो व्यापक बनबैत अछि।
जालक सब सं महत्त्वपूर्ण पक्ष एकर सामाजिक प्रश्न अछि। जाति आ प्रेमक टकराव, स्त्रीक स्वतंत्रता, पितृसत्ताक दबाव, राजनीतिक छल-प्रपंच आ विकासक नाम पर उपेक्षित ग्रामीण जीवन – ई सभ प्रश्न उपन्यास मे एक-दोसरा सं जुड़ि कए अबैत अछि। एहि कारणें जाल कें मात्र अंतरजातीय प्रेमक उपन्यास कहब उचित नहि होयत। ई ओहि समाजक कथा अछि जाहि मे व्यक्ति अपन स्वतंत्र अस्तित्वक खोज करैत अछि आ ओकर चारू कात सामाजिक, पारिवारिक आ राजनीतिक जाल पसरल अछि।
अंततः जालक सार्थकता एहि बात मे अछि जे प्रेम कें लेखक सामाजिक परिवर्तनक प्रश्न सं जोड़ैत छथि। सुनीता आ महेसरक संघर्षक परिणति मात्र व्यक्तिगत विजय अथवा पराजयक प्रश्न नहि रहि जाइत अछि; ई पाठक कें सोचबाक लेल बाध्य करैत अछि जे समाज व्यक्ति कें अपन जीवनक निर्णय लेबाक कतेक स्वतंत्रता दैत अछि। उपन्यासक कथा एहि प्रश्नपर ठहरैत अछि जे मनुष्य कें बांधनिहार जाल वास्तव मे बाहर अछि वा ओकर भीतर सेहो?
सच्चिदानंद सच्चूक जाल एहि अर्थ मे समकालीन मैथिली उपन्यासक एकटा महत्त्वपूर्ण सामाजिक आख्यान अछि। एकर शक्ति अछि – जीवनक नजदीक पात्र, ग्रामीण मिथिलाक परिवेश, बोलचालक जीवंत भाषा, प्रेमक मानवीय संवेदना आ सत्ता-संरचनापर प्रश्न। एकर किछु अंश मे घटनाक बहुलता आ टिप्पणीप्रधानता कथा कें कखनो-कखनो भारी बनबैत अछि, मुदा समग्र रूप सं ई रचना पाठक कें कथा सुनबैत-सुनबैत समाजक ओहि अदृश्य जाल दिस देखबैत अछि जाहि मे व्यक्ति, परिवार, जाति, राजनीति आ सत्ता एक-दोसरा सं ओझरायल अछि। एहि कारणें जालक मूल प्रश्न प्रेमक जीत सं बेसी मनुष्यक स्वतंत्रताक प्रश्न बनि जाइत अछि – आ संभवतः अही ठाम एहि उपन्यासक वास्तविक साहित्यिक महत्त्व निहित अछि। ई उपन्यास अंतिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित अछि।