सोनी चौधरी
‘पुरैनिक पात साजि सेनुर पिठार
धूपदीप दूध लावा पुष्प केर हार ।।
दुभिधान फूलफल आँचरि लाल
बिषहरिदेवी कयल सोलहो शृंगार ।।
हाथ सुपारी शोभै खोईंछामे पान
बिषहरि करथि हे शुभ कल्याण ।।’
ई गीत बिसहरि कें समर्पित अछि, जे साँपक देवी छथि। मानल जाइत अछि जे ओ लोक कें सांपक डाँस सँ बचबैत छथि। आइ संपूर्ण मिथिला बिसहरि, नचारी आ अन्य लोकगीत सँ गूँजि रहल अछि। एहि गीतक संग नव विवाहिताक जीवन उत्साह, जिज्ञासा आ आनंद सँ भरल अछि। मिथिलाक सांस्कृतिक परंपरा, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार आ जीवनशैली केर मामिलामे विविधतापूर्ण अछि। मिथिलाक एकटा एहने अनमोल पावनि अछि मधुश्रावणी, जे लगभग एक पखवाड़ाक अनुष्ठान अछि, जाहिमे नवविवाहिता विशेष रूप सँ सहभागी बनैत छथि। पारंपरिक आ धार्मिक मूल्य केर समर्थन संग-संग ई पवित्र पावनि मानवीय मूल्य कें सेहो जगजियार करैत अछि। मानल जाइत अछि जे मधुश्रावणी केर आरंभ प्राचीन कालमे नवविवाहित कन्या कें हुनक विवाहित जीवनमे सहजता लयबा लेल कयल गेल छल।
एहि पावनिक उद्देश्य पर्यावरण केर बारेमे जागरूकता जगेबाक संगहि संस्कृति कें बनौने राखब सेहो अछि। पर्यावरण केर महत्व कें दर्शेबा लेल अनुष्ठानमे जूही आ मैना सन पौधा केर उपयोग विशेष रूप सँ कयल जाइत अछि। एहि पावनिमे सभ दिन अलग-अलग कथा सुनाओल जयबाक परंपरा अछि। ई कथा मानव अस्तित्व लेल प्रकृति केर महत्वक बारेमे सेहो ज्ञान दैत अछि।
परंपरागत विवाहक बाद प्राकृतिक छवि छटा सँ भरल पहिल सावन मास बहुत महत्वपूर्ण होइत अछि। मिथिला मे एहि मासमे नवविवाहिता तेरह दिन धरि ई पावनि धूम धाम सँ विधि विधानक संग मनबैत छथि। एकर विशेषता अछि जे एहि पावनिमे नव विवाहिता अद्यावधि नून केर सेवन नहि करैत छथि। पति केर दीर्घायु होयबाक कामनासँ सोलह श्रृंगार कऽ माँ पार्वतीक संग नाग-नागिन बिसहराक पूजा करैत छथि। ई एहन पावनि थिक जाहिमे पंडित आ यजमान दुनू नारी होइत छथि। संगहि पूजामे सेहो बेसी महिला समाज उपस्थित रहैत छथि। विषहरिक पूजामे समर्पित अछि हमर सुंदर अभिव्यक्ति..
‘पोखरिक महार जाय माटि हम लायब।
पाँचो बहिन विषहरिकें रूप गढ़ायब।।
उज्जर पिठार पुरैनक पात पर लगायब।
आहे ताहि पर सेनुर केर ठोप सजायब।।
फूल दूध लावा कुसुमक फूल चढ़ायब।
देवी विषहरि गीत गाबि अहाँकें रिझायब।।
धूप दीप अक्षत चानन केसर चढ़ायब।
पियर आँचरि लहठी काजरसँ सजायब।।
विधि विधान संग मंगला गौरी कें मनायब।
सभ दूभिपात डाला साजि बीनी हम गायब।।
पहिल दिन मौना पंचमी विषहारा केर जन्म।
दोसर विहुला मनसा मंगला गौरी कथादंत।।
तेसर दिन सागर मंथन वसुधा केर जन्म।
चारिम पतिव्रत सती महिमा कथा केर संग।।
पांचम महादेवक माया आदि धरि अनंत।
छठम गंगा गौरी अयली,कामदेव केर अंत।।
सातम गौरीक तप आठम परिणय केर आनंद।
सुनू नवम दिन कोना मैनाक मोह भेल भंग।।
दसम दिन कार्तिक गणपति भाइ भागमंत।
ग्यारहम संध्या बसंत सुकन्या लीली केर प्रसंग।।
बारहम दिन गोसाउनि मनाबू कथा बल बसंत।
तेरहम दिन श्रीकर कथा सुनिक करू अंत।।
विधिकरी सोहागिन टेमी सँ दागथि पाँचो ठाम।
आहे ईहो अद्भुत नारी शक्तिक धैर्य केर प्रमाण।।
मिथिलाक धिया वधु सभ जानकी केर स्वरूप।
सदिखन कन्त केर सुरक्षा हेतु लेथि चंडी रूप।।
स्कंदपुराणवर्णित महिमा अहाँक गाबथि संत।
देवी सुनियौ निहोरा अचल दियऽ सोहाग अनंत।।’
पूजाक विधिमे सर्व प्रथम माटिक नाग नागिन आ हरैदक गौरी बनाओल जाइत छथि। नवविवाहिता तेरह दिन धरि भोरे फूल आ साँझमे पत्ता सँ डाली सजबैत छथि। धूप, दीप, अक्षत, चन्दन, मैना पत्ता, सिंदूर, पीठार, कुमकुम, कुसुमक फूल, फल, नीम, लताम, बाँस, चिड़चिड़ी आदिक पत्ता कें जमा कऽ विधि-विधान सँ पूजा करैत छथि, जे व्रती कें प्रकृति प्रेमक संदेश दैत अछि। संगहि साँप केर पूजा सँ संदेश भेटैत अछि जे अनावश्यक साँप के मारब सर्वथा अनुचित आ अधर्म थिक। पूर्णतः प्रकृति प्रेमसँ जुड़ल ई पावनि माटि, पानि आ हरियरीकेर अद्भुत बन्हन थिक। नवविवाहिताक श्रृंगारक सामग्री कपड़ा, लहठी, टिकुली, सिनूर, धानक लावा आ भोजन सामग्री सभ सासुर सँ अबैत अछि।
विधि पूर्वक माँ गौरीक संग नाग-नागिनक पूजा भेलाक उपरांत कथा कहल जाइत अछि। तत्पश्चात मंगलमय भक्ति गीतक गायन सँ सम्पूर्ण प्रकृति भक्तिमय भऽ जाइत अछि। एहि पावनिमे बिषहारा केर गीतक विशेष महत्त्व अछि। बैरसी पूजा, चनाईनागक पूजा, कुसुमावतीक पूजा, पिंगला पूजा, लिली नागक पूजा, आ साठी केर पूजा केलाक बाद बीनी पढ़ल जाइत अछि। पहिल दिन मौना पंचमी आ बिषहारा केर जन्मक कथा, दोसर दिन बिहुला माणसाक कथा, बिषहारा आ मंगला गौरीक कथा, तेसर दिन पृथ्वी जन्म ओ समुद्र मंथन, चारिम दिन सती आ पतिव्रताक कथा, पांचम दिन दंतकथा पर आधारित महादेव परिवारक कथा, छठम दिन गंगा कथा, गौरी जन्म ओ काम दहन, सातम दिन गौरीक तपस्या, आठम दिन गौरी विवाह आ बरियाती केर कथा, नवम दिन मैनाक मोह भंग, दशम दिन कार्तिकेय आ गणेश जन्मक कथा, ग्यारहम दिन संध्या विवाह, लिली जन्म ओ सुकन्याक कथा आ बारहम दिन बल बसंत गोसओनि कथा, तेरहम दिन राजा श्रीकर केर कथा महिला पुरोहितक द्वारा संपन्न कराओल जाइत अछि। एहि पावनिमे टेमी दागबाक विशेष प्रथा अछि। एहिमे वर पानक पत्ता सँ नवविवाहिता केर आँखि कें मुनैत छथि, विधकरी द्वारा जरैत टेमीसँ व्रती केर दुनू पैर, ठेहुन आ एकटा हाथ आदिमे पाँच अथवा सात जगह पर स्पर्श काराओल जाइत अछि। जे महिलाक सहन शीलताक द्योतक थिक।
सावन मासक रिमझिम फुहारक बीच एहि पावनि केर संबंध मे एहन मान्यता अछि जे गौरी महादेव कें पति रूप मे प्राप्त करबाक हेतु हजारों साल धरि तपस्या कयलनि, तत्पश्चात महादेव प्रसन्न भऽ गौरी कें अर्धांगिनी स्वीकार कयलनि। जाहिसँ सावन मास अचल सोहाग आ सुखी दाम्पत्य जीवनक अटूट प्रतीक बनि गेल। स्कंद पुराणक मुताबिक नाग देवता आओर माँ गौरी केर पूजनसँ स्त्री आजीवन सोहागिन रहैत छथि। संगहि ईहो मान्यता अछि जे आदिकालमे कुरूप्रदेशक राजा केर तपस्या सँ प्राप्त अल्पायु पुत्र कें मंगला गौरी आ नागक पूजा सँ चिरायु कें दीर्घायु बनयबामे सफल भेल रहथि। पुत्रक दीर्घायु भेला सँ हर्षित राजा एहि पूजाकें राजकीय पूजाक स्थान देने छलाह।
मधुश्रावणीक शुरुआत सावन मासक कृष्ण पक्षक पंचमी तिथि सँ होइत अछि। जखन कि समापन शुक्ल पक्षक तृतीया तिथिकें होइत अछि। एहि बेरक पूजा 25 जुलाई सँ प्रारंभ भेल अछि, जे 7 अगस्त धरि मनाओल जायत। जेना कि मधुश्रावणी व्रत नैहरमे विधिवत मनाओल जाइत अछि। व्रतक दौरान विशेष रूप सँ सासुरेक अन्न ग्रहण करबाक विधान अछि। नून वर्जित अछि। किछु महिला फलाहार पर रहैत छथि। हुनकर स्वास्थ्य पर विशेष निगरानी राखब जरूरी अछि। स्वास्थ्य कें देखैत व्रती द्वारा एहि अवधि मे सेंधा नूनक उपयोग करब श्रेयस्कर साबित होयत।
(लेखिका ख्यातिलब्ध गायिका आ कवयित्री छथि)



