डॉ. राघव नाथ झा
दीपावली पर दीप जरायब आ लक्ष्मी-गणेशक पूजा करब देशभरि मे प्रचलित परंपरा अछि, मुदा मिथिला मे एहि पर्व सं जुड़ल किछु एहन लोकपरंपरा सेहो अछि, जे एकरा विशिष्ट पहिचान दैत अछि। दीपावलीक राति एतय जरैत उल्का लए कए भ्रमण किएक कयल जाइत अछि? हुक्का-लोली परंपराक की महत्त्व अछि? अगिला भोर महिला सभ सूप पीटि दरिद्रता कें घर सं बाहर करबाक कामना किएक करैत छथि? एहि परंपरा सभ मे मिथिलाक धार्मिक आस्था, पितरक प्रति श्रद्धा आ सुख-समृद्धिक लोककामना समाहित अछि।
मिथिला मे दीपावलीक अवसर पर सभ सं पहिने घरक गोसाईं घर अर्थात कुलदेवताक पूजास्थल पर विशेष पूजा-अर्चना कयल जाइत अछि। एकर संग घरक मुख्य दरबज्जा, आंगन, तुलसी चौड़ा, दलान आ अन्य स्थान पर दीप जराओल जाइत अछि। गोसाईं घरक पूजा परिवारक परंपरा आ पूर्वज सभ सं जुड़ल संस्कारक स्मरण करबैत अछि।
दीपावलीक राति मिथिला मे उल्का भ्रमणक परंपरा प्रचलित अछि, जकरा स्थानीय बोली मे उक फेरब अथवा उक्का-पाती कहल जाइत अछि। खढ़, संठी आ पटुआ आदि सं बनाओल उल्का जरा कए घरक चारू कात घुमाओल जाइत अछि। लोकमान्यता अछि जे महालय आ पितृपक्षक दौरान आएल पितर सभ कें एहि प्रकाशक माध्यम सं विदाइ देल जाइत अछि। एहि अवसर पर परंपरागत उल्का भ्रमण मंत्रक पाठ सेहो कयल जाइत अछि।
एहि मंत्रक भाव पितृपक्ष मे आएल ज्ञात-अज्ञात पितर सबहक प्रति श्रद्धा प्रकट करैत हुनकर मंगलमय प्रस्थानक कामना करब अछि। मंत्रक पाठ मे क्षेत्रीय आ परंपरागत पाठभेद सेहो भेटैत अछि। बच्चा सभ मे हुक्का-लोली परंपरा कें लए कए विशेष उत्साह रहैत अछि। पुरान कपड़ा सं बनाओल जरैत गेंद अथवा मशाल लए बच्चा सभ एहि खेल मे भाग लैत छथि। ई मिथिलाक दीपावली सं जुड़ल विशिष्ट लोकपरंपरा अछि।
दीपावलीक दोसर दिन भोर मे दरिद्र खिहाड़बाक परंपरा निभाओल जाइत अछि। महिला सभ संठी सं सूप पीटैत कहैत छथि,अन्न-धन लक्ष्मी घर आऊ, दरिद्रा बाहर जाऊ। एहि माध्यम सं घर मे अन्न, धन, सुख आ समृद्धिक आगमन तथा दरिद्रताक निष्कासनक मंगलकामना कयल जाइत अछि।
मिथिलाक ई परंपरा सभ बतबैत अछि जे दीपावली मात्र दीप आ सजावट तक सीमित पर्व नहि अछि। एहि मे पितरक प्रति सम्मान, कुलदेवताक आराधना, लोकजीवनक सहज अभिव्यक्ति आ परिवारक सुख-समृद्धिक कामना एक संग समाहित अछि। बदलैत समय मे एहि परंपरा सभ कें बुझब आ अगिला पीढ़ी धरि पहुंचायब हमर सभक सांस्कृतिक दायित्व अछि।