अजगैबीनाथ : जतय शिव-संकल्प आकार ग्रहण करैत अछि
श्रावणी पथ : कड़ी–6
कुमार नितेश
कांवर यात्राक उद्गम सुल्तानगंजे किएक मानल जाइत अछि? ई प्रश्न देखबा मे जतेक सरल प्रतीत होइत अछि, उत्तर ओतेक सहज नहि अछि। कारण, उत्तरवाहिनी गंगा मात्र सुल्तानगंजे मे नहि बहैत छथि। हुनकर ई स्वरूप कहलगांव सं लए कए बटेश्वर धरि देखल जाइत अछि। तखन एहन की विशेषता अछि, जाहि कारण सुल्तानगंज कांवर यात्राक प्रथम पड़ाव बनि गेल?
शायद एकर उत्तर मात्र भूगोल मे नहि, बल्कि ओहि अद्भुत संगम मे निहित अछि, जतय गंगा, शिव आ संकल्प एकहि संग उपस्थित छथि। वस्तुतः कांवर यात्राक पहिल डेग देवघर दिस नहि उठैत अछि। ताहि सं पहिने यात्री अजगैबीनाथ महादेवक समक्ष ठमकि श्रद्धापूर्वक प्रणाम करैत अछि। ओतय गंगाजल बाद मे उठाओल जाइत अछि, मुदा संकल्प पहिने उठैत अछि। एहि कारण सुल्तानगंज मात्र नदीक घाट नहि रहि जाइत, बल्कि एक पवित्र तीर्थ बनि जाइत अछि।
भारतवर्ष मे गंगाक कात बसल असंख्य नगर छथि। उत्तरवाहिनी गंगाक तट सेहो कतेको स्थान पर भेटैत अछि, मुदा प्रत्येक नदी-तट तीर्थ नहि बनि सकैत अछि। तीर्थ ताहि स्थान कें कहल जाइत अछि, जतय प्रकृति, लोकविश्वास, साधना आ सांस्कृतिक स्मृति परस्पर एकसूत्र मे बान्हल होइत अछि। सुल्तानगंजक महत्त्व सेहो एहि दिव्य संगम मे निहित अछि। एतय उत्तरवाहिनी गंगाक पावन प्रवाह अछि, प्राचीन लोक परंपराक निरंतर धारा अछि आ ओकर मध्य अवस्थित छथि अजगैबीनाथ महादेव। ई दिव्य उपस्थिति एहि भूमि कें कांवर यात्राक उद्गम-स्थलीक गौरव प्रदान करैत अछि।
साओन मास अबिते लाखो कांवरिया गंगा सं जल भरैत छथि। देखनिहार कें लगैत अछि जे यात्राक आरंभ एतय सं भेल, मुदा वास्तविकता ई अछि जे यात्रा जल उठेबा सं नहि, संकल्प धारण करबा सं आरंभ होइत अछि। जल तं मात्र ओहि संकल्पक दृश्य प्रतीक अछि। वास्तविक यात्रा ओहि क्षण प्रारंभ होइत अछि, जखन श्रद्धालु अजगैबीनाथ महादेवक समक्ष शीश नवा कए अपन अंतःकरण मे एक पवित्र व्रतक संकल्प ग्रहण करैत अछि। एहि कारण सुल्तानगंज सं देवघर धरिक यात्रा मात्र चरणक यात्रा नहि रहैछ, बल्कि मोनक साधना बनि जाइत अछि।
अजगैबीनाथ महादेवक मंदिर स्वयं एहि सत्यक प्रतीक अछि। गंगाक प्रवाहक मध्य स्थित ई प्राचीन शिवधाम वर्षाकाल मे चारूकात जल सं घेरल रहैत अछि। दूर सं देखलापर एहन प्रतीत होइत अछि मानू प्रवाहित गंगामाय स्वयं शिव कें अपन अंक मे धारण केने छथि। भारतीय सांस्कृतिक प्रतीक-चेतना मे ई दृश्य सहजहि ओहि पौराणिक प्रसंगक स्मरण करबैत अछि, जतय गंगाक अवतरण भगवान शिवक जटा सं होइत अछि। दृश्य अवश्य भिन्न अछि, मुदा भाव पूर्णतः समान अछि। जल आ शिवक एहन दिव्य सान्निध्य कांवर यात्रा कें एक विशिष्ट आध्यात्मिक आधार प्रदान करैत अछि।
लोकपरंपरा एहि क्षेत्र कें जाह्नु ऋषिक स्मृति सं सेहो जोड़ैत अछि। मान्यता अछि जे हुनके कारण गंगा कें जाह्नवी नाम प्राप्त भेल। इतिहास एहि कथाक मूल्यांकन अपन दृष्टि सं कए सकैत अछि, किंतु लोकस्मृतिक अपन स्वतंत्र महत्त्व होइत अछि। सभ्यता मात्र शिलालेख वा अभिलेख सं नहि बनैत अछि, बल्कि ओहि लोकस्मृति सं सेहो निर्मित होइत अछि, जकरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक अपन हृदय मे संजोगने रहैत छथि। सुल्तानगंजक सांस्कृतिक चेतना मे जाह्नु ऋषि, जाह्नवी आ अजगैबीनाथ एक-दोसर सं अलग नहि छथि। एहि कारण एतय गंगा मात्र नदी नहि, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतिक अविरल प्रवाह बनि जाइत छथि।
यदि कांवर यात्राक आधार मात्र उत्तरवाहिनी गंगा रहितथि, तं एकर उद्गम अन्य कोनो स्थान पर सेहो विकसित भए सकैत छल। मुदा सुल्तानगंज मे उत्तरवाहिनी गंगाक संग-संग शिवक सजीव उपस्थिति सेहो अछि। इएह विशेषता एहि यात्रा कें मात्र जलयात्रा बनि रहबा सं रोकैत अछि। एतय जल ग्रहण करय बला श्रद्धालु पहिने शिवक साक्षी बनैत अछि, तकर बाद पथक यात्री। ई क्रमहि यात्राक वास्तविक आत्मा अछि।
भारतीय परंपरा मे संकल्पक अत्यंत महत्त्व मानल गेल अछि। कोनो धार्मिक अनुष्ठान संकल्प बिना पूर्ण नहि मानल जाइत। संकल्प मात्र शब्दक उच्चारण नहि, बल्कि स्वयं कें अनुशासनक अधीन करबाक दृढ़ निश्चय अछि। कांवर यात्रा एहि अनुशासनक सार्वजनिक अभिव्यक्ति अछि। कांवरिया अपन आचरण, वाणी, भोजन, व्यवहार आ यात्राक प्रत्येक चरण मे संयम स्वीकार करैत छथि। एहि दृष्टि सं कांवर मात्र कान्ह पर राखल बांसक संरचना नहि, बल्कि अंतःकरण मे धारण कएल गेल संकल्पक प्रतीक अछि।
एहि कारण यात्राक कठिनाइ सेहो मात्र शारीरिक नहि होइत अछि। रौद, बरखा, थाल, भीड़ आ दीर्घ दूरी प्रत्येक यात्रीक समक्ष उपस्थित होइत अछि, तथापि लाखो श्रद्धालु बिना कोनो बाह्य बाध्यता एहि पथ पर अग्रसर रहैत छथि। ई मात्र आस्थाक परिणाम नहि, बल्कि संकल्पक ओहि अद्भुत शक्तिक परिचायक अछि, जे मनुष्य कें अपन सामान्य सीमा सं बहुत आगू लए जाइत अछि। जखन संकल्प जागृत भए जाइत अछि, तखन थकान सेहो यात्राक गति रोकि नहि सकैत अछि।
एतय आबि श्रावणी पथक अर्थ आरो गंभीर भए जाइत अछि। ई मात्र सुल्तानगंज सं देवघर धरि गेल सड़क नहि, बल्कि मनुष्यक अंतर्मन मे चलय बला साधनाक पथ सेहो अछि। एहि मार्ग पर मात्र चरण आगू नहि बढ़ैत अछि, मोन सेहो क्रमशः परिवर्तित होइत चलैत अछि। यात्रा जतबा बाह्य होइत अछि, ओतबे आंतरिक सेहो। शायद एहि कारण एहि पथ पर चलय बला व्यक्ति लौटि कए ओहि स्वरूप मे नहि रहैछ, जाहि स्वरूप मे घर सं निकलल छल।
अजगैबीनाथ आ बाबा बैद्यनाथक संबंध सेहो मात्र दू शिवालयक संबंध नहि अछि। एक स्थान पर संकल्प जन्म लैत अछि, दोसर स्थान पर ओकर पूर्णता प्राप्त होइत अछि। एक शिवक समक्ष यात्री अपना कें यात्राक लेल समर्पित करैत अछि, दोसर शिवक समक्ष ओहि समर्पण कें अर्पणक रूप प्रदान करैत अछि। एहि दुनू शिवधामक बीच पसरल श्रावणी पथ मात्र भौगोलिक दूरी नहि, बल्कि साधनाक अखंड निरंतरता अछि।
एतय आबि फेर ओहि प्रश्नक स्मरण होइत अछि – जं शरीर थाकि गेल अछि, तं यात्रा के कए रहल अछि? उत्तर शायद शरीर मे नहि, संकल्प मे निहित अछि। शरीरक अपन सीमा होइत अछि, मुदा संकल्पक नहि। ओ संकल्पे थाकल चरण मे गति, अन्हार राति मे दिशा आ भीड़क बीच धैर्य बनि यात्रा कें पूर्णता सं पहुंचाबैत अछि। ओहि संकल्पक बल पर मनुष्य अपन अंतर्निहित शक्तिक परिचय पबैत अछि।
एहि कारण कांवर यात्रा मात्र दूरी तय करबाक यात्रा नहि, बल्कि संकल्पक यात्रा बनि जाइत अछि। एक शिवक समक्ष लेल गेल संकल्प दोसर शिवक समक्ष पूर्णता प्राप्त करैत अछि। दुनू शिवधामक बीच निरंतर एक अदृश्य आध्यात्मिक प्रवाह बहैत रहैत अछि, जे मात्र गंगाजल मे नहि, बल्कि मनुष्यक अंतर्मन मे सेहो अनुभव कएल जा सकैत अछि।
तें श्रावणी पथ कें मात्र सुल्तानगंज सं देवघर धरि जाए बला मार्ग कहि देब ओकर व्यापक अर्थ कें छोट करब होयत। ई ओहि सांस्कृतिक चेतनाक नाम अछि, जतय गंगा प्रवाह प्रदान करैत छथि, शिव दिशा देखबैत छथि आ संकल्प मनुष्य कें साधनाक पूर्णता धरि पहुंचा दैत अछि। अजगैबीनाथ एहि चेतनाक प्रथम आलोक छथि, बाबा बैद्यनाथ ओकर पूर्णता। आ दुनूक बीच अविराम बहैत रहैत अछि श्रद्धा, साधना आ संकल्प सं आलोकित ओ पावन श्रावणी पथ, जकर स्मरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धापूर्वक कएल जाइत रहल अछि।