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सुखाइत कांवर झील : मिथिलाक जल-धरोहरक अस्तित्व पर संकट, संरक्षणक प्रयास कतेक प्रभावी?

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By Samadiya Mithila
September 17, 2026 4 Min Read
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  • सच्चिदानंद सच्चू

मिथिलाक बेगूसराय जिला मे पसरल कांवर झील मात्र एकटा जलाशय नहि, बल्कि उत्तर बिहारक जल, जैव-विविधता आ लोकजीवनक महत्वपूर्ण आधार अछि। कांवर झील नाम सं चिन्हल जाएबला ई झील एशियाक सब सं पैघ मीठ पानिक ऑक्सबो झीलक रूप मे परिचित अछि। गंडक नदीक पुरान धारक बदलैत प्रवाह सं बनल एहि आर्द्रभूमि कें 2020 मे रामसर साइटक मान्यता भेटल। बिहार पर्यटन विभाग सेहो एकरा एशियाक सब सं पैघ फ्रेशवाटर ऑक्सबो लेक आ पक्षी-दर्शनक महत्वपूर्ण स्थल बतबैत अछि।

मुदा जे जल-धरोहर हजारो स्थानीय आ प्रवासी पक्षीक आश्रय रहल अछि, तकर भविष्य आब चिंताजनक बनि गेल अछि। पछिला दू दशक मे झीलक जलक्षेत्र लगातार सिकुड़ल अछि। अतिक्रमण, खेतीक विस्तार, जलप्रवाहक बदलल स्वरूप, गादिक जमाव, कम बरखा आ जलवायु परिवर्तन एकरा प्रभावित कए रहल अछि। 2026 मे प्रकाशित एकटा रिपोर्ट सेहो बतबैत अछि जे झीलक जल,  माछ आ भविष्य तीनू पर संकट अछि।

कांवरक महत्व मात्र पक्षी आ माछ धरि सीमित नहि अछि। ई आर्द्रभूमि बाढ़िक समय अतिरिक्त पानि कें अपन भीतर समेटबाक, भूजल व्यवस्था कें प्रभावित करबाक आ स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन बनौने रखबाक काज करैत अछि। रामसरक प्रबंधन योजना मे सेहो जलधारण क्षमता, नदी सं जलक आवक, आर्द्रभूमिक भीतर जलक आवागमन आ स्थानीय समुदाय कें संरक्षणक हिस्सा बनाबय पर जोर देल गेल अछि। योजना मे गाद हटाबय, पुरान जलमार्ग पुनर्जीवित करब आ जलक प्राकृतिक प्रवाह बहाल करबाक विस्तृत सुझाव अछि।

सरकारी प्रयास कतय पहुंचल?

कांवरक संरक्षण लेल सरकारी स्तर पर प्रयास नहि भेल अछि, एहन कहब सेहो सही नहि होयत। केंद्रक राष्ट्रीय योजना फॉर कंजर्वेशन ऑफ एक्वाटिक इकोसिस्टम (एनपीसीए) अंतर्गत आर्द्रभूमिक जलग्रहण क्षेत्र, गादि हटायब, जलप्रवाह सुधारब, जैव-विविधता संरक्षण, सीमांकन आ सामुदायिक भागीदारी जेकां काज लेल सहायता देबाक व्यवस्था अछि।

कांवरक नाम एनपीसीए अंतर्गत बिहारक संरक्षित झीलसभक सूची मे अछि। मुदा 2024 मे केंद्र सरकार द्वारा संसद मे देल गेल जानकारी एकटा महत्वपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करैत अछि। बेगूसराय स्थित काबरतल लेल केंद्रक दिस सं 64.10 लाख रुपैया जारी भेल छल, मुदा राज्य सरकारक सूचना अनुसार ओकर उपयोग शून्य रहल छल। अर्थात् स्वीकृत संरक्षण राशि आ जमीन पर भेल काजक बीच स्पष्ट अंतर देखाइ पड़ैत अछि।

2025 मे जल संसाधन विभाग कांवर सं जुड़ल नालाक उड़ाही आ चेक डैम निर्माण लेल 10.34 करोड़ रुपैयाक टेंडर निकाललक। एहि काज कें 18 मास मे पूरा करबाक लक्ष्य राखल गेल छल। ई डेग झीलक जलप्रवाह पुनर्स्थापित करबाक दृष्टि सं महत्वपूर्ण मानल जा सकैत अछि।

एहि बीच 2026 मे सरकार झील क्षेत्र कें पर्यटन आ इको-पार्कक रूप मे विकसित करबाक योजना पर सेहो आगू बढ़ल अछि। मुदा पर्यटन विकासक संग-संग झीलक मूल पारिस्थितिकी बचेनाइ सब सं पैघ चुनौती रहत।

मुदा प्रयास पर्याप्त अछि?

उपलब्ध तथ्य देखला पर स्पष्ट होइत अछि जे चुनौतीक आकारक तुलना मे प्रयास अखनहुं पर्याप्त नहि देखाइ पड़ैत अछि। 2025 मे बेगूसराय वन विभागक अधिकारीक अनुसार झील लेल तैयार कयल गेल  इकोलॉजिकल रीस्टोरेशन प्लान कें स्वीकृति नहि भेटल छल। एहि योजना मे विस्तृत सर्वेक्षण, पक्षीक आवासक अध्ययन, ड्रेजिंग, वर्षाजलक संचयन, गंडक सं जल आनबाक संभावना, चेक डैम, गाद हटायब आ देशी माछक उत्पादन बढ़ेबाक प्रस्ताव छल।

सब सं गंभीर प्रश्न झीलक सीमांकन आ अतिक्रमणक अछि। फरवरी 2026 मे पटना उच्च न्यायालय संबंधित मामिला मे सरकार सं कांवरक अधिसूचित क्षेत्र कें अतिक्रमणमुक्त करबाक स्थिति आ समय-सीमा पर जवाब मांगलक। न्यायालय मे प्रस्तुत अभिलेखक अनुसार 1989 मे अधिसूचित 15,780 एकड़ क्षेत्र मे मात्र 1,564 एकड़ जमीनक सेटलमेंट पूरा भेल छल।

जुलाई 2026 मे राष्ट्रीय हरित अधिकरण सेहो कांवर झीलक संरक्षणक मामिला पर स्वतः संज्ञान लैत बिहार सरकार सहित विभिन्न संस्था सभ कें पक्षकार बनौलक। अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन आ मलाह समुदाय पर पड़ैत प्रभाव एहि कारबाइक प्रमुख संदर्भ छल।

कांवर समाप्त भेल तं की होयत?

कांवरक अस्तित्व समाप्त होयब मात्र एकटा झीलक समाप्ति नहि होयत। एकर पहिल असरि जल-पक्षी आ माछक आवास पर पड़त। प्रवासी पक्षीक लेल महत्वपूर्ण पड़ाव समाप्त भए सकैत अछि। मलाह समुदाय आ झील पर निर्भर लोकक आजीविका प्रभावित होयत। जलधारण क्षेत्र घटला सं वर्षाक समय लगपासक इलाका मे जलनिकासी आ बाढ़िक प्रकृति सेहो बदलि सकैत अछि।

तकर बाद संकट मात्र पर्यावरणक नहि, बल्कि अर्थव्यवस्था आ सांस्कृतिक सेहो होयत। कांवरक संग जुड़ल नाह, माछ, पक्षी-दर्शन, जयमंगलागढ़ क्षेत्रक पर्यटन आ स्थानीय रोजगारक अवसर कमजोर पड़त। सब सं पैघ क्षति होयत मिथिलाक एकटा विशिष्ट प्राकृतिक पहिचानक।

कांवर कें बचाबय लेल आब मात्र सौंदर्यीकरण वा पर्यटन परियोजना पर्याप्त नहि। झीलक प्राकृतिक जलप्रवाह बहाल करब, वैज्ञानिक ढंग सं गाद हटायब, अतिक्रमणक स्थायी समाधान, जलक गुणवत्ता पर निगरानी, पक्षी-माछक आवास संरक्षण आ स्थानीय किसान-मलाह समुदाय कें सहभागी बनाक’ दीर्घकालीन प्रबंधन जरूरी अछि। रामसर प्रबंधन योजना मे सेहो संरक्षण आ स्थानीय आजीविकाक बीच संतुलन पर विशेष जोर देल गेल अछि।

कांवरक सवाल असल मे एकटा झीलक सवाल नहि अछि। ई सवाल अछि जे मिथिलाक विकासक बीच ओकर प्राकृतिक जल-धरोहर कतेक बचत? कांवर मे पानि रहत तं मात्र पक्षी नहि, एकटा पूरा पारिस्थितिकी रहत। पानि सूखल तं’ धीरे-धीरे ओहि संग जुड़ल जीवनक एकटा पूरा संसार सेहो सुखा सकैत अछि।

 

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