गाद प्रबंधनक नव सूत्र : इलाजक नाम पर नदीक नव खनन तं नहि?
पुष्यमित्र
काल्हि कैबिनेटक बैसार मे बिहार सरकार अपन गाद प्रबंधन नीति कें स्वीकृति दए देलक। केंद्र सरकारक निष्क्रियताक कारण बिहार सरकार कें एहि दिशा मे कोनो-ने-कोनो निर्णय लेबए पड़ल। एहि नीति मे सरकार गाद कें बेकार माटि नहि, बल्कि एकटा संसाधनक रूप मे देखैत अछि। नदी, बराज आ जलाशय सं गादि निकालि ओकर उपयोग सड़क, रेल, सिंचाइ, बाढ़ि सुरक्षा आ भवन निर्माण मे करबाक योजना अछि।
सुनय मे ई विचार नीक लगैत अछि। मुदा असल प्रश्न अछि – गादि कोना निकालल जाएत, कतेक मात्रा मे निकालल जाएत आ ओकर पर्यावरणीय प्रभाव की होयत? कतहु बाढ़ि सं निपटबाक नाम पर नदीक नव खनन तं शुरू नहि भए जाएत?
बिहारक नदी सभ हिमालय आ तराई क्षेत्र सं भारी मात्रा मे गादि अनैत अछि। जल संसाधन विभागक अनुसार, असगर कोसी नदी बराहक्षेत्र मे प्रत्येक वर्ष औसतन करीब 95 मिलियन घनमीटर गादि अनैत अछि। मैदान मे पहुंचला पर नदीक गति कम भए जाइत अछि आ गादिक एक भाग नदीक पेट मे जमा होमय लगैत अछि।
एकरा सं नदीक पानि बहबाक क्षमता प्रभावित होइत अछि। नदी मे बालूक टीला आ टापू बनए लगैत अछि आ कखनो-कखनो नदी अपन धार सेहो बदलि लैत अछि। विभागक अनुसार, पछिला करीब 250 वर्ष मे कोसी लगभग 112 किलोमीटर पश्चिम दिस खिसकि चुकल अछि।
कोसी पर भेल शोध मे सेहो पैघ स्तर पर गादि जमबाक पुष्टि भेल अछि। आइआइटी कानपुरक राजीव सिन्हा आ हुनकर सहयोगी सभक अध्ययन मे कोसीक विभिन्न भाग मे भारी मात्रा मे तलछट जमा होयबाक बात सामने आयल अछि। एकर सीधा असरि नदीक पेटक ऊंचाइ आ नदीक स्वरूप पर पड़ैत अछि।
एहन स्थिति मे जतय असामान्य रूप सं गादि जमा भए गेल हो, ततय सीमित मात्रा मे गादि निकालला सं नदीक पानि बहबाक क्षमता बढ़ि सकैत अछि। मुदा ई बात बुझब आवश्यक अछि जे गादि आबि जाएब कोनो एक बेरक घटना नहि अछि। प्रत्येक मानसून मे हिमालय सं नव गादि आबैत रहत। आइ जतय सं गादि निकालल गेल, संभव अछि किछु वर्षक बाद ओतहि फेर पहिलका स्थिति उत्पन्न भए जाए।
तें असल प्रश्न ई नहि जे गादि निकालल जाए वा नहि। प्रश्न ई अछि जे गादि कतए सं, कतेक मात्रा मे आ कतेक अंतराल पर निकालल जाए।
वास्तव मे गादि प्रबंधनक बहस नव नहि अछि। फरवरी 2026 मे बिहारक जल संसाधन विभाग राष्ट्रीय हरित अधिकरण अर्थात एनजीटीक पूर्वी क्षेत्रीय पीठ मे दाखिल प्रतिशपथ-पत्र मे केंद्र सरकारक संग भेल पत्राचार आ अपन दिस सं चलि रहल योजनाक विवरण देने छल। एहि संग केंद्र कें पठाओल पत्र आ विभागीय योजना सं जुड़ल कागज-पत्तर सेहो संलग्न कएल गेल छल।
एहि मामिला सं जुड़ल बादक कागज-पत्तर मे गंडकक सहायक छाड़ी नदीक उदाहरण सेहो सामने आयल। सितंबर 2025 मे जल संसाधन विभाग गोपालगंजक जिलाधिकारी कें एनजीटीक निर्देश उद्धृत करैत कहलनि जे छाड़ी नदी दुनू कात करीब 10 सं 20 फीट धरि अतिक्रमणक चपेट मे अछि आ ओकर स्वरूप नहर जेकां भए गेल अछि। विभाग अतिक्रमण हटेबाक लेल कारबाइ करबाक निर्देश देने छल।
नव नीति मे निकालल गेल गादि कें निर्माण कार्य मे उपयोग करबाक बात कहल गेल अछि। ई उपयोगी सोच भए सकैत अछि। मुदा जं नदी सं निकालल गादिक बाजार बनि गेल आ ओकर मांग पैघ भए गेल तं की होयत?
बालू खननक अनुभव हमरा सभक सोझां अछि। नदीक पेट सं जरूरत सं बेसी सामग्री निकालला पर गहींर खद्धा बनि जाइत अछि। जं गादि निकासी अर्थात डिसिल्टिंगक नाम पर सेहो लगातार खुदाई होइत रहल तं नदीक पेट कतहु उथल आ कतहु असामान्य रूप सं गहींर भए सकैत अछि।
एकरा सं नदीक बहावक गति आ दिशा बदलि सकैत अछि, तट कटाव बढ़ि सकैत अछि आ नदी तथा भूजल बीचक प्राकृतिक संबंध सेहो प्रभावित भए सकैत अछि। सोन नदी मे पैघ पैमाना पर भेल बालू खनन सं आयल बदलाव एहि खतराक एकटा उदाहरण अछि।
तें गादि कें संसाधन मानब गलत नहि अछि। कठिनाइ तखन शुरू होयत जखन संसाधनक मांग नदीक विज्ञान सं पैघ भए जाएत।
गादक असल कथा बिहार सं शुरू नहि होइत अछि। हिमालय विश्वक सभ सं नव आ तेजी सं बदलैत पर्वत शृंखला मे सं एक अछि। भारी मानसूनी बरखा, भूस्खलन आ पहाड़क ढलानक कटाव सं माटि आ चट्टानी पदार्थक पैघ मात्रा नदी मे पहुंचैत अछि। कोसी, कमला, बागमती आ गंडक जेकां नदी सभ नेपाल आ हिमालयी क्षेत्र सं भारी मात्रा मे तलछट अनैत बिहार पहुंचैत अछि। मैदान मे नदीक ढाल कम भेला पर एहि तलछटक एक भाग नदी मे जमा होमए लगैत अछि।
एकरा बाद मानवीय हस्तक्षेप समस्या कें आर जटिल बना दैत अछि। तटबंध नदी कें सीमित गलियारा मे बहबाक लेल बाध्य करैत अछि। बाढ़िक मैदान, चौर आ आर्द्रभूमि सिकुड़ैत जाइत अछि। प्राकृतिक जलनिकासक बाट बंद होइत जाइत अछि। परिणामस्वरूप पानिक फैलाव आ निकासक लेल उपलब्ध स्थान लगातार कम होइत जाइत अछि।
एहि पूरा बहस मे फरक्का बराज कें सेहो नजरअंदाज नहि कएल जा सकैत अछि। फरक्का गंगाक प्राकृतिक प्रवाह आ गादिक आगू बढ़बाक प्रक्रिया कें प्रभावित कएलक अछि। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन मे बराजक ऊपर तलछटक जमाव आ नदीक बनावट मे भेल बदलाव दर्ज कएल गेल अछि।
केंद्र सरकार पूर्व मे भीमगौड़ा सं फरक्का धरि गंगा मे डिसिल्टिंगक संदर्भ मे दिशा-निर्देश सेहो जारी कए चुकल अछि। बिहार बहुत दिन सं फरक्का कें राज्यक बाढ़ि आ गादिक समस्या सं जोड़ैत आयल अछि। राज्यक तर्क अछि जे हिमालय सं आबयबला भारी तलछट गंगा मे जमा होइत अछि आ फरक्का संरचना तथा ओकरा सं जुड़ल प्रवाह मे बदलाव एहि समस्या कें आर जटिल करैत अछि।
मुदा प्रश्न मात्र फरक्काक नहि अछि। आवश्यकता पूरा नदी आ पूरा नदी-बेसिन कें एक संग देखबाक अछि। विशेषज्ञक अनुसार समाधान पूरा नदीक सफाई करब मे नहि, बल्कि नदी-बेसिन स्तर पर गादिक वैज्ञानिक प्रबंधन मे अछि।
पहिल काज होयबाक चाही – नदी सभक वैज्ञानिक मानचित्रण। ई पता लगाओल जाए जे प्रत्येक वर्ष कतेक तलछट आबि रहल अछि, कतय जमा भए रहल अछि आ कोन स्थान पर एकर जमाव वास्तव मे बाढ़िक खतरा बढ़ा रहल अछि।
दोसर, मात्र ओतहि सीमित गादि निकासी कएल जाए जतए ओकर वैज्ञानिक आधार हो। कतेक गहींर धरि खुदाई होयत आ कतेक मात्रा मे गादि निकालल जाएत, एकर सीमा पहिने सं निर्धारित हो। प्रत्येक मानसूनक बाद नदीक पेटक सर्वेक्षण सेहो हो।
तेसर, निकालल गेल गादिक गुणवत्ता जांचब आवश्यक अछि। प्रत्येक गादि सड़क वा भवन निर्माण योग्य नहि होइत अछि। ओकरा मे माटि, जैविक पदार्थ आ अन्य प्रदूषक अलग-अलग मात्रा मे रहि सकैत अछि।
चारिम, गादिक समस्या जाहि स्रोत सं उत्पन्न होइत अछि, ओतहु काज करबाक आवश्यकता अछि। हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र मे माटिक कटाव कम करबाक, बंजर भूमि आ बाढ़िक मैदान कें बचेबा, प्राकृतिक जलनिकासक बाट फेर खोलबाक आ नदी कें ओकर प्राकृतिक पसार लेल पर्याप्त स्थान देबाक जरूरत अछि।
बिहारक नव गाद प्रबंधन नीति एकटा अवसर अछि। जं वैज्ञानिक मानचित्रण, सीमित निकासी, पर्यावरणीय निगरानी आ पारदर्शी उपयोगक संग एकरा लागू कएल गेल तं नदीक क्षमता बहाल करबाक संग निर्माण क्षेत्र कें उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराबय मे सेहो सहायता भए सकैत अछि।
मुदा जं गाद कें मात्र निर्माण सामग्री बुझि लेल गेल तं खतरा ई अछि जे बाढ़ि प्रबंधनक नाम पर नदीक नव खनन शुरू भए जाए। नदीक पेट मे गहींर खद्धा बनि सकैत अछि, बहावक दिशा आ गति बदलि सकैत अछि, किछु स्थान पर तट कटाव बढ़ि सकैत अछि आ भूजल तथा नदीक प्राकृतिक संबंध सेहो बिगड़ि सकैत अछि। किछु परिस्थिति मे डूब आ कटावक खतरा घटबाक बदला बढ़ि सेहो सकैत अछि।
तें एहि नीतिक सफलता एहि सं नहि नापल जेबाक चाही जे एक वर्ष मे कतेक गादि निकालल गेल। असल प्रश्न ई होयबाक चाही जे नदीक प्राकृतिक संतुलन कतेक बचल आ बाढ़िक खतरा कतेक घटल।
गादि कें संसाधन बनायब नीक बात अछि।
मुदा नदी कें गादिक गोदाम बुझब खतरनाक होयत।
अंततः प्रश्न ई अछि – नदी सं कतेक गादि निकालल जाएत, ई बाजार तय करत वा नदीक विज्ञान?